मेरा नाम मुस्कान है और मैं अठारह साल की हूँ। मेरा जिस्म बहुत गोरा और कातिलाना है – लंबे बाल, मोटी जांघें और छत्तीस-छब्बीस-छत्तीस का फिगर। मैं बीए फर्स्ट ईयर की छात्रा हूँ और मेरा एक बॉयफ्रेंड है आयुष, जिसके साथ मैं छह महीने तक शारीरिक संबंध में थी। आयुष मुझ पर पैसे तो बहुत खर्च करता था, लेकिन मेरी जिस्मानी भूख कभी पूरी नहीं करता था। उसका लंड बहुत छोटा था। जब भी वह उसे मेरे अंदर डालता, मुझे कुछ खास महसूस नहीं होता था। वह जल्दी थक जाता और झड़ जाता। मैं पूरी तरह गरम भी नहीं हो पाती थी कि वह ठंडा पड़ जाता। मेरी चुत हमेशा अधूरी और तरसती रहती थी।
एक दिन पापा के दोस्त रमेश अंकल हमारे घर आए। उनकी उम्र साठ साल है और उनकी पत्नी का निधन हो चुका है। उम्र के बावजूद वे बहुत फिट और मजबूत हैं, मानो रोज़ जिम जाते हों। उस दिन मैं अपनी सहेली प्रिया की पार्टी में जा रही थी। मैंने काला टाइट क्रॉप टॉप, नीली मिनी शॉर्ट्स और लंबे बूट पहने थे। मेरी नाभि और जांघें पूरी नंगी दिख रही थीं। मैं उस दिन गज़ब की आइटम लग रही थी। पापा ने मुझे उनसे मिलवाया। रमेश अंकल के मुझे देखते ही उनका लंड पैंट में तन गया। मेरी निगाहें उनके पैंट के उभार पर जा अटकीं। वह उभार इतना मोटा और लंबा था कि मैं समझ गई-यही वह मर्द है जिसकी मुझे कब से तलाश थी।
अगले दिन पापा काम से बाहर गए हुए थे। लैंडलाइन पर रमेश अंकल का फोन आया। उन्होंने पापा से मिलने की बात कही, लेकिन मैंने साफ बता दिया कि पापा घर पर नहीं हैं और मैं अकेली हूँ। फिर मैं नहाने चली गई। नहाते समय दरवाज़े की घंटी बजी। तौलिया लपेटकर दरवाज़ा खोला तो सामने रमेश अंकल खड़े थे। मेरा गीला तौलिया में लिपटा जिस्म देखते ही उनका लंड पूरी तरह खड़ा हो गया। वे अंदर आ गए और दरवाज़े की कुंडी लगा दी।
उसके बाद वो मुझे ज़बरदस्ती हर तरफ़ किस करने लगे-मेरे होंठों पर, गर्दन पर, कंधों पर। मैं थोड़ा सा एक्टिंग करने लगी जैसे मैं खुद को छुड़ाना चाह रही हूँ, “अंकल… नहीं… पापा…” लेकिन अंदर ही अंदर मेरी चुत पानी छोड़ने लगी थी। उनके मोटे हाथों ने मेरा तौलिया खींच लिया। मेरा पूरा नंगा जिस्म उनके सामने था-गोरे-गोरे मोटे स्तन, चुचीयाँ कड़ी, नाभि चमकती हुई, और नीचे घनी झाड़ी वाली गीली चुत। उन्होंने मुझे अपनी गोद में उठाया और ऊपर बेडरूम में ले गए। उन्होंने मुझे बिस्तर पर फेंका। मेरी जांघें फैल गईं।
रमेश अंकल ने अपनी पैंट खोली। उनका लंड बाहर निकला—मोटा, लंबा, काला-सा, नसों से भरा हुआ, कम से कम 8-9 इंच का और मोटाई ऐसी कि मुट्ठी में भी न समाए। आयुष का छोटा लंड तो इसके आगे कुछ भी नहीं था।“देख बेटी, यही चाहिए तुझे ना?” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा और अपना लंड मेरे मुँह के पास ले आए। मैंने बिना हिचक उसके सिरे को चाटा, फिर पूरा मुँह में ले लिया। गला भर गया लेकिन मैंने चूसा-जोर से, गंदी आवाज़ों के साथ। उनकी झाड़ी मेरे चेहरे में घुस गई। वो कराह रहे थे, “आह मुस्कान… चुस बेटी… चुस पापा के दोस्त का लंड…”
फिर उन्होंने मुझे चित लिटाया। मेरी जांघें फैलाकर अपनी जीभ मेरी चुत पर लगा दी। चाटने लगे—फड़फड़ाती हुई चुत की पंखुड़ियों को, क्लिट को चूसते हुए। मैं चीखने लगी, “आह्ह्ह अंकल… और… और चाटो…” मेरी चुत से पानी की धार बहने लगी। फिर उन्होंने अपना मोटा लंड मेरी चुत के मुँह पर लगाया और एक झटके में पूरा अंदर धँस दिया। मेरी चुत चीख उठी। इतना मोटा लंड पहली बार अंदर गया था। दर्द और मज़ा दोनों एक साथ। उन्होंने जोर-जोर से ठोकना शुरू कर दिया-धमाकेदार चुदाई। बिस्तर चरमरा रहा था, मेरी स्तन उछल रहे थे, उनकी झाँटे मेरी चुत से टकरा रही थीं।
“लो बेटी… ले पापा के दोस्त का लंड… आयुष का छोटा वाला भूल जा…” वो गंदी गंदी बातें कर रहे थे। मैं भी बेशर्म हो गई थी, “हाँ अंकल… चुदो मुझे… फाड़ दो मेरी चुत… और जोर से… आह्ह्ह…”
उन्होंने कई पोजीशन बदलीं-कुत्ते की तरह से, ऊपर बैठकर, साइड से। हर बार उनका लंड मेरी चुत की गहराई तक पहुँच रहा था। मैं कई बार झड़ चुकी थी, चुत सिकुड़-सिकुड़ कर उनका लंड निचोड़ रही थी। आखिर में उन्होंने मुझे गोद में बैठाया, मेरे स्तन मुँह में लिए और नीचे से जोरदार ठोके। मैं चीखते हुए चरमसुख में पहुँची-पूरी बॉडी काँप रही थी, चुत से पानी की बौछार निकली। उसी समय रमेश अंकल भी गुर्राए और अपना गर्म गाढ़ा वीर्य मेरी चुत की गहराई में उड़ेल दिया। इतना ज्यादा कि बाहर बहने लगा। हम दोनों पसीने से लथपथ बिस्तर पर लेटे थे। उनका लंड अभी भी आधा खड़ा था, मेरी चुत से वीर्य रिस रहा था। मैंने मुस्कुराते हुए उनके लंड को फिर से हाथ में लिया और धीरे से सहलाया।
“अंकल… अब से आप ही मेरे बॉयफ्रेंड हो। आयुष को छोड़ दिया मैंने। हर दिन आना… मेरी चुत को इस मोटे लंड से भरते रहना। ”
रमेश अंकल ने मुझे कसकर चूमा और कहा, “बिल्कुल बेटी… अब तू सिर्फ मेरी है। मैं तुझे हर रात चरम्सुख दूँगा। ”
उस दिन के बाद रमेश अंकल लगभग रोज़ आते है। पापा के सामने तो अंकल-भतीजी का नाटक , लेकिन जैसे ही पापा बाहर जाते है, वो मुझे नंगा करके घंटों चोदते है। मेरी चुत अब उनकी आदी हो गई है। आयुष का छोटा लंड याद भी नहीं आता। मैं हर बार कई-कई बार झड़ती हूँ और उनका गर्म वीर्य अंदर लेकर सोती हूँ।
अब मैं पूरी तरह संतुष्ट हूँ। पापा के दोस्त का मोटा लंड ही मेरा असली बॉयफ्रेंड है-और मेरी चुत अब हमेशा भरी और खुश रहती है।
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