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विधवा बॉस Shruti की चपरासी Vinod ने बुझाई प्यास – Hot Story in Hindi with Audio – Rangeen Kahaniya Episode 3

Wet Boss Shruti getting satisfied by peon vinod.

मेरा नाम Shruti है। मैं 22 साल की विधवा औरत हूँ। आज से लगभग दो साल पहले मेरी शादी रमेश नाम के एक बिजनेसमैन से हुई थी। रमेश एक टेक्सटाइल फैक्ट्री के मालिक थे। लेकिन शादी के महज़ दो महीने बाद ही एक प्लेन क्रैश में उनकी मौत हो गई।

उसके बाद मैं घर में अकेली उदास रहने लगी। फैक्ट्री का कोई देखभाल करने वाला नहीं था। ससुर जी ने कहा कि मैं ही ऑफिस का काम संभालूँ। बस यों ही मैं फैक्ट्री की मेमसाब बन गई।

फैक्ट्री मैं सिर्फ़ मर्द कामगार थे। उनमें से ज्यादातर की नज़रें मुझ पर गंदी थीं। लेकिन सबसे ज्यादा गंदी और लालची नज़र फैक्ट्री के चपरासी विनोद की थी।

मैं ऊपर ऑफिस में बैठकर हिसाब-किताब और देखरेख करती थी। नीचे सब कामगार अपना काम करते। शाम को जब सब चले जाते, तो मैं और विनोद मिलकर फैक्ट्री को ताला लगाते और फिर घर निकलते।

एक शाम की बात है। सब कामगार जा चुके थे। अचानक मुझे बहुत थकान और चक्कर आने लगे। मैंने विनोद को आवाज़ दी, “विनोद, एक गिलास पानी लाओ ज़रा।”

वो पानी लेकर आया। लेकिन जैसे ही वो मेरे पास पहुँचा, उसके हाथ से गिलास फिसल गया और सारा ठंडा पानी मेरे ऊपर गिर पड़ा।

मैं चिल्लाई, “ये क्या बत्तमीजी है, नालायक!”

उस दिन मैंने सफेद रंग की हल्की लीफ प्रिंट वाली साड़ी पहनी थी। गीला होने के बाद साड़ी मेरे शरीर से पूरी तरह चिपक गई। मेरी नाभि के आसपास की त्वचा चमक रही थी। ब्लाउज़ के अंदर से मेरे भारी स्तन और गहरी दरार साफ़ नज़र आ रही थी। निप्पल्स सख्त होकर उभर आए थे।

विनोद ने वो नज़ारा देखा तो उसका दिमाग़ पागल हो गया। वो मेरे पास आया और दोनों हाथों से मेरे स्तनों को ज़ोर-ज़ोर से दबाने लगा। मैंने उसे धक्का देने की कोशिश की, लेकिन उसकी पकड़ बहुत मज़बूत थी। उसने मेरे होंठों पर जबरदस्ती किस करना शुरू कर दिया।

“रोकिए मेमसाब… आज रुकिए मत… मैं जानता हूँ आप भी यही चाहती हैं…” वो फुसफुसाया।

फिर विनोद ने मेरी साड़ी का पल्लू धीरे-धीरे खींचा और मेरी नाभि पर अपनी गर्म जीभ फेरनी शुरू कर दी। उसकी गरम साँसें और नम जीभ मेरी त्वचा पर सरक रही थीं… मेरे पूरे शरीर में आग-सी लग गई।

एक अजीब-सी कंपकंपी मेरे बदन में दौड़ गई। मैं ज़ोर से कराह उठी, “आआह्ह्ह्ह्ह…”

लेकिन साथ ही साथ मैं विरोध भी करती रही। हाथों से उसे धक्का देने की कोशिश करती रही, पर उस वक्त जो सुख वो मुझे दे रहा था, उसकी वजह से मेरी आवाज़ लगातार कमज़ोर होती जा रही थी। मेरा मन और शरीर दोनों अब उसके वश में होने लगे थे।

विनोद ने मुझे दोनों हाथों से गोद में उठा लिया और ऑफिस की बड़ी लकड़ी की मेज़ पर लिटा दिया। मेज़ पर रखी फाइलें और कागज़ इधर-उधर बिखर गए, लेकिन उस वक्त किसी को उनकी परवाह नहीं थी।

उसने मेरी साड़ी को कमर तक ऊपर सरकाया। पेटीकोट का नाड़ा खींचकर एक झटके में खोल दिया। अब मैं सिर्फ़ गीली पैंटी और ब्रा में थी।

उसने अपनी शर्ट उतारी। उसका मजबूत, पसीने से तर बदन मेरे सामने था। पैंट का बटन खोला और उसका सख्त, मोटा लंड बाहर आ गया। मैंने उसे देखा तो मेरी साँसें थम-सी गईं। दो साल से मेरे शरीर में कुछ नहीं गया था… और अब सामने ये इतना मोटा, लंबा और फड़कता हुआ… मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं।

विनोद मेरे ऊपर झुका। उसने मेरी पैंटी साइड में सरकाई और अपनी दो उँगलियाँ अंदर डाल दीं। मैं ज़ोर से चीख पड़ी — “आह्ह्ह्ह…!”

वो उँगलियाँ तेज़ी से अंदर-बाहर करने लगा। मैं लगातार चीखने लगी, “आआह्ह्ह्ह… आह… आह्ह… आआह्ह्ह… विनोद… आह्ह्ह्ह… आआह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह… विनोद…”

मेरी चूत अब पूरी तरह गीली हो चुकी थी। रस टपक-टपक कर बह रहा था।

“मेमसाब… अब नहीं रुक सकता…” उसने कहा और अपना लंड मेरे मुंह पर रख दिया। एक ज़ोरदार धक्का। आधा अंदर चला गया। मैं दर्द से कराही।दूसरा धक्का… और वो पूरी तरह मेरे अंदर था।

फिर शुरू हुआ वो जुनून। वो मुझे जोर-जोर से पेलने लगा। मेज़ हर धक्के पर हिल रही थी। मेरे स्तन उछल रहे थे। उसकी साँसें मेरे गले पर पड़ रही थीं।

“मेमसाब… कितनी टाइट… कितनी गर्म… आह्ह… दो साल से भूखा था मैं…” वो बड़बड़ा रहा था।

मैं अब विरोध नहीं कर रही थी। मेरे नाखून उसकी पीठ में गड़ रहे थे। मेरी कमर खुद-ब-खुद ऊपर उठ रही थी। मैं अब हर धक्के का जवाब दे रही थी। कमरे में सिर्फ़ हमारी सिसकारियाँ, चटकने की आवाज़ और मेज़ की चरमराहट गूँज रही थी।

कुछ देर बाद मुझे लगा कि मेरे अंदर कुछ टूटने वाला है।

“विनोद… मैं… मैं झड़ रही हूँ… आआह्ह्ह्ह!”मैं ज़ोर से चीखी। मेरा पूरा शरीर काँप उठा। ऑर्गेज़्म की लहर ने मुझे बहा लिया। उसी पल विनोद ने भी आखिरी ज़ोरदार धक्का मारा और मेरे अंदर गरम-गरम सारा माल उड़ेल दिया । वो कई बार काँपा और फिर मेरे ऊपर ही ढेर हो गया।

कई मिनट तक हम ऐसे ही पड़े रहे। साँसें तेज़। पसीना बह रहा था।

फिर विनोद उठा। मेरी तरफ देखकर मुस्कुराया और बोला – “मेमसाब… अब से हर शाम ऑफिस बंद होने के बाद यही होगा… ठीक है न?

”मैं चुप रही। बस धीरे से सिर हिला दिया।

उस रात जब मैं घर लौटी, तो आईने में खुद को देखा। होंठ सूजे हुए। गले पर निशान। चेहरे पर वो उदासी अब गायब थी।

शायद अब मुझे अकेलापन नहीं सताएगा। क्योंकि हर शाम… फैक्ट्री के ऑफिस में… विनोद मेरा इंतज़ार करेगा।

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By admin

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