मेरा नाम सीमा है और मैं २९ साल की हूँ। पेशे से मैं एक कामवाली बाई हूँ। घर की माली हालत ठीक नहीं थी और पिताजी के कैंसर के ऑपरेशन के लिए पैसों की सख्त ज़रूरत थी। इसलिए मैं हमारे गाँव के बड़े सेठ रमेश अग्रवाल जी के घर काम करने लगी।
सेठ जी के घर में सिर्फ़ वो और उनकी पत्नी रहते थे। एक दिन जब मैं काम करने उनके घर गई, तो उनकी पत्नी मायके गई हुई थीं। उस दिन मैंने हरे रंग की साड़ी पहनी थी और काले रंग का टाइट ब्लाउज़, जो मेरी गोरी चमकती त्वचा पर बहुत जँच रहा था। मेरी कमर नंगी दिख रही थी और साड़ी का पल्लू थोड़ा सरककर मेरी गहरी नाभि उभार रहा था।
रसोई में बर्तन माँज रही थी कि अचानक सेठ जी ने पीछे से मुझे कसकर पकड़ लिया। उनकी साँसें मेरी गर्दन पर गर्म-गर्म पड़ रही थीं। उन्होंने जबरदस्ती मेरी गर्दन पर चूम लिया… चट… चट… और ज़ोर से चूसा।
मैं घबरा कर चिल्लाई – “अरे सेठ जी! ये आप क्या कर रहे हैं? ये सब गलत है!”
सेठ जी मुस्कुराए और गहरी आवाज़ में बोले – “कुछ गलत नहीं है मेरी रानी… बस थोड़ा मज़ा…”
मैंने उन्हें धक्का मारकर अलग किया और कहा – “ये क्या बदतमीज़ी है? मैं आज के बाद यहाँ काम नहीं करूँगी!” और जैसे ही मैं जाने लगी, सेठ जी ने जेब से 500 के नोटों की 3-4 गड्डियाँ निकालीं और मेरे सामने फेंक दीं।
“सुन मेरी जान… मैं जानता हूँ तुझे पैसों की कितनी सख्त ज़रूरत है। तो क्यों न तू मेरी ज़रूरत पूरी करे… और मैं तेरी?”
उनकी बात सुनकर मेरे मन में कुछ पल के लिए संघर्ष हुआ… लेकिन फिर मैंने धीरे से सिर हिलाया – हाँ में।
सेठ जी ने तुरंत मुझे अपनी बाँहों में उठा लिया, जैसे कोई प्यारी गुड़िया हो। मुझे रसोई के पास वाले डाइनिंग टेबल पर लिटा दिया। मेरी साड़ी थोड़ी सरक गई थी। उन्होंने पहले मेरी दोनों टाँगों को सहलाया… फिर धीरे-धीरे चूमने लगे।
चूम… चट… चूम… उनकी जीभ मेरी जाँघों पर फिरने लगी। मैं सिहर उठी और मज़े से कराह उठी – “आआआह्ह्ह्ह्ह… सेठ जी… ओह्ह सेठ जी…”
फिर उन्होंने मेरी साड़ी को और ऊपर सरकाया। मेरी पैंटी तक दिखने लगी। उनकी जीभ अब मेरी जाँघों के अंदरूनी हिस्से पर… गीली-गीली चाट रही थी। मैं पागल हो रही थी – “आआह्ह… ओह्ह सेठ जी… बस ऐसे ही… और ज़ोर से चाटिए सेठ जी… म्म्म्म…”
अब सेठ जी ने मेरी नाभि पर होंठ रखे। पहले हल्का सा चूमा… फिर जीभ से गोल-गोल घुमाने लगे। मेरी नाभि में जीभ डालकर चूसने लगे। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे जन्मों-जन्मों की प्यास मिट रही हो।
“ओह्ह सेठ जी… आह्ह्ह… और गहराई से… ओह्ह्ह सेठ जी… मज़ा आ रहा है… बहुत मज़ा…” मैं बार-बार कराह रही थी।
फिर सेठ जी ने अपनी शर्ट उतारी। उनकी चौड़ी छाती और हल्की बालों वाली बॉडी देखकर मेरी साँसें तेज़ हो गईं। उन्होंने मेरे ब्लाउज़ के हुक खोल दिए। मेरे बड़े-बड़े स्तन बाहर आ गए। सेठ जी ने दोनों को हाथों में भर लिया और ज़ोर-ज़ोर से दबाने लगे।
“आआह्ह्ह… सेठ जी… दबाइए… और ज़ोर से… ओह्ह सेठ जी…”
उन्होंने मेरे एक निप्पल को मुँह में लिया और ज़ोर से चूसने लगे… चट… चूस… चट… दूसरा निप्पल पिंच करते हुए। मैं तड़प उठी – “आआआह्ह्ह्ह… ओह्ह सेठ जी… बस… और चूसिए… म्म्म्म… बहुत अच्छा लग रहा है…”
फिर सेठ जी ने मेरी पैंटी उतार दी। मेरी चूत पहले से ही गीली हो चुकी थी। उन्होंने उँगली डाली और अंदर-बाहर करने लगे। मैं चीख पड़ी – “आह्ह्ह… सेठ जी… और तेज़… ओह्ह सेठ जी… फाड़ दीजिए मुझे…”
अब सेठ जी ने अपना लुंड बाहर निकाला – मोटा, लंबा, सख्त। उन्होंने मेरी टाँगें फैलाईं और एक झटके में पूरा अंदर डाल दिया।
“आआआआह्ह्ह्ह्ह… सेठ जी… ओह्ह्ह… कितना मोटा है… भर गया अंदर… ओह्ह सेठ जी…”
वो जोर-जोर से धक्के मारने लगे। टेबल हिल रहा था। हर धक्के पर मैं चिल्ला रही थी – “आह्ह… और ज़ोर से… चोदिए सेठ जी… ओह्ह सेठ जी… फाड़ दो मेरी चूत… म्म्म्म… हाँ… ऐसे ही… ओह्ह्ह…”
कई मिनट तक वो मुझे रसोई टेबल पर चोदते रहे। आखिर में दोनों साथ-साथ झड़ गए। मैंने उनकी पीठ नाखूनों से खरोंच दी और कराहते हुए बोली – “ओह्ह सेठ जी… कितना मज़ा आया… अब से रोज़ ऐसा ही करना… मेरी सारी ज़रूरतें आप पूरी करेंगे ना?”
सेठ जी मुस्कुराए और मेरे होंठों पर गहरा किस करते हुए बोले – “हाँ मेरी रानी… रोज़… और भी ज़्यादा मज़े लेंगे।”
और इस तरह रसोई में शुरू हुई हमारी गुप्त चुदाई की कहानी… जो आज भी जारी है।
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