मेरा नाम मनीषा है। मैं २९ साल की हूँ, मिडिल क्लास फैमिली से। करीब एक महीने पहले मेरी शादी अभिनव से हुई, जो मुझसे ५ साल बड़े और अमीर घराने के हैं।
विदाई पर मम्मी-पापा ने बस इतना कहा, “मनीषा, अब तुम पराया धन हो। घर की इज्ज़त रखना, वरना दोबारा मुड़कर न देखना पड़े।”
अभिनव के माता-पिता गुज़र चुके थे। घर में बस उनकी १९ साल की छोटी बहन अंजलि रहती थी – पूरी मॉडर्न, पार्टी-क्लब, शॉर्ट ड्रेस और हाई हील्स वाली लड़की।
सुहागरात की वो रात। मैं लाल जोड़े में सजी, बिस्तर पर अकेली बैठी अभिनव का इंतज़ार कर रही थी। दिल धड़क रहा था, थोड़ा डर भी लग रहा था, थोड़ी उत्सुकता भी।
अचानक दरवाज़ा खुला। मैंने सोचा अभिनव आए, लेकिन अंजलि थी। हाथ में गरम दूध का गिलास लिए मुस्कुराई और बोली, “भाभी, दूध पी लो। भैया थोड़ी देर में आएँगे। सुहागरात के लिए तैयार हो जाओ ना।
”मैंने मुस्कुराकर गिलास लिया और धीरे-धीरे पूरा पी गई। अंजलि चली गई।
कुछ मिनटों में ही शरीर में आग लग गई। साँसें तेज़, दिल धड़क रहा था। नीचे गर्मी फैल गई, चूत फड़फड़ाने लगी। एक अनजानी, तेज़ कामुक भूख जाग उठी – ऐसी भूख जो पहले कभी महसूस नहीं की थी।
मैं बिस्तर पर लेट गई। एक हाथ अपनी चूत पर रख दिया, उँगली अंदर डालकर खुद को सहलाने लगी। दूसरा हाथ अपनी चुचियों पर – ज़ोर-ज़ोर से दबाने लगी।“आह्ह… आह्ह… ओह्ह… आआआह्ह… उफ्फ़… आह्ह्ह्ह… आआआह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह… हाँ… आह्ह्ह… उफ्फ़्फ़… ओह्ह माई… आआआआह्ह्ह्ह…
आह्ह्ह्ह… हाँ… ओह्ह्ह्ह…आआआह्ह्ह… उफ्फ़… आह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह… हाँ… हाँ… आआआआह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह… आह्ह्ह्ह… उफ्फ़्फ़… आआआह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह… आह्ह्ह्ह…
कमरा मेरी सिसकारियों से गूँज उठा। मैं खो चुकी थी उस आग में। तभी दरवाज़ा फिर खुला। मैंने सोचा अब अभिनव आए होंगे। लेकिन फिर वही अंजलि।
इस बार अंजलि ने अपनी चोली उतार रखी थी। सफेद ब्रा में उसके गोरे स्तन उभरे हुए थे। नीचे गुलाबी घाघरा। वो मेरी तरफ बढ़ी और एक झटके में मेरे ऊपर चढ़ गई।“इतना क्यों तड़प रही है तू जानू? मैं हूँ ना तेरी प्यास बुझाने के लिए।
मेरा पूरा शरीर आग की लपटों में था, फिर भी मैं डरते हुए बोली, “अंजलि… ये क्या कर रही हो? मैं तुम्हारी भाभी हूँ… भाभी माँ समान होती है…”
अंजलि ठहाका लगाकर हँसी, उसकी हँसी में विजय का भाव था।
“अरे जानू, वो ज़माना गया। अब कोई भाभी-देवरानी वाला नाटक नहीं। तुम हमारी रखैल हो। हमने तुम्हारे परिवार को पैसे देकर तुम्हें खरीदा है। मेरा भैया नामर्द है। तुमसे शादी करवाना मेरा प्लान था, क्योंकि मुझे लड़कियाँ पसंद हैं। ये बात बाहर नहीं आनी चाहिए, इसलिए तुम्हारे मम्मी-पापा को पैसा देकर तुम्हें यहाँ लाया।”
मेरे होश उड़ गए। सब कुछ समझ आ गया। ये शादी नहीं, एक सौदा था। मैं ज़िंदगी भर इस लड़की की रखैल बनकर रहने वाली हूँ।
बाहर से अभिनव की आवाज़ आई – “दरवाज़ा लॉक कर दिया है। अब आराम से मज़े करो।”
वो बाहर ही खड़ा था, सब कुछ जानते हुए।
अंजलि ने ब्रा उतार फेंकी। उसके गोरे स्तन सामने थे, गुलाबी निप्पल्स तने हुए। उसने मेरे जोड़े को फाड़ दिया – साड़ी-पेटीकोट ज़मीन पर गिर गए। वो मेरे ऊपर झुक गई, होंठ मेरे होंठों पर चिपका दिए। उसकी जीभ मेरी जीभ से खेलने लगी। एक हाथ चूत पर, उँगलियाँ तेज़ अंदर-बाहर, दूसरा हाथ चुचियों को ज़ोर से मसल रहा था।
“आह्ह… अंजलि… नहीं… प्लीज़…” मैं कह तो रही थी, पर मेरा शरीर उसकी हर हरकत का जवाब दे रहा था। मेरी चूत पहले से ही पूरी गीली और फड़फड़ा रही थी। अंजलि ने मेरी टाँगें चौड़ी कीं और अपना गरम मुँह मेरी चूत पर रख दिया। जैसे ही उसकी जीभ ने मेरी चूत को छुआ, मैं जोर से चीख पड़ी — “आआआआह्ह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह माई गॉड… आह्ह्ह्ह… हाँ… बस वहीं… ओह्ह्ह्ह…”
वो लगातार चाटती रही, मेरी चूत को चूसती रही, जीभ अंदर डालकर मेरी चूत को पूरी तरह सहलाती रही। मैं बार-बार झटके खा रही थी। “आह्ह्ह… उफ्फ़… ओह्ह्ह… और ज़ोर से… आआआह्ह… हाँ… चूसो… आह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह… मैं… मैं मर जाऊँगी… आआआआह्ह्ह्ह…” मैंने उसका सिर पकड़ लिया और अपनी चूत पर और ज़ोर से दबा दिया। वो और तेज़ी से चाटने लगी। आखिरकार मैंने जोर से चीखते हुए पहला ऑर्गेज़्म पा लिया — “आआआआआह्ह्ह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह्ह… हाँ… आ रहा है… आ रहा है… आआआआह्ह्ह्ह्ह… उफ्फ़्फ़… ओह्ह्ह्ह्ह…” पूरा शरीर काँप उठा और मेरी चूत से रस बहने लगा।
अंजलि रुकी नहीं। वो मुस्कुराई और बोली, “अभी तो शुरुआत है जानू…” फिर अंजलि उठी। उसने मेरी एक टाँग उठाई, अपनी टाँग मेरी टाँगों के बीच फंसाई और सिसर पोजीशन में आ गई। हमारी चूतें एक-दूसरे से रगड़ खाने लगीं। “हाँ… बस ऐसे… रगड़ो… ओह्ह्ह… कितना अच्छा लग रहा है… आह्ह्ह्ह…” हम दोनों तेज़-तेज़ हिलने लगे। चूतें आपस में टकरा रही थीं, चूत चूत से रगड़ रही थी। “आआआह्ह्ह… ओह्ह्ह… हाँ… और तेज़… आह्ह्ह्ह… मैं… मैं फिर आ रही हूँ… ओह्ह्ह्ह…” “मैं भी… साथ में… आह्ह्ह… हाँ… चीखो भाभी… चीखो… आआआआह्ह्ह्ह…”
हम दोनों ने एक साथ जोर से चीखते हुए दूसरा ऑर्गेज़्म पाया। पूरा बिस्तर गीला हो गया, साँसें तेज़ चल रही थीं और शरीर पसीने से तर था।
अंजलि ऊपर आई और मेरे कान में फुसफुसाई – “आज से ये सुहागरात मेरी है और तू मेरी रखैल है। हर रात मैं तुझे ऐसे ही चोदूँगी… 69 में, सिसर में, हर पोजीशन में। और हाँ… भैया सिर्फ नाम के लिए तेरा पति हैं। असली खेल तो हम दोनों का रहेगा… हमेशा।”
उस रात के बाद मेरी ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई। बाहर से मैं अभिनव की पत्नी दिखती हूँ, लेकिन घर के अंदर मैं अंजलि की रखैल बन चुकी हूँ। वो मुझे हर जगह इस्तेमाल करती है – बिस्तर पर, बाथरूम में, सोफे पर, छत पर, किचन में।
जब अंजलि बुलाती है, मैं चुपचाप उसकी जिस्मानी भूख मिटाने हाज़िर हो जाती हूँ। मैं खुद को उसकी पूरी रखैल और उसे अपनी मालकिन मान चुकी हूँ। उसकी हर इच्छा सबसे ऊपर है, बिना विरोध के मान लेती हूँ।
और सुहागरात? वो आज भी हर रात दोहराई जाती है – बस पति की जगह बिस्तर पर एक रखैल और उसकी मालकिन होती है।
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